छाते की छाँव
कीचड़ सने पांव
लबालब गलियां
तैरती कागजी कश्तियां
खिड़कियों से आती फुहारें
सीलन से सजी दीवारें
कपड़े सुखाने का जुगाड़
कहाँ बांधे अब तार
नज़र आने लगी हरियाली
पकौड़ों संग
चाय की प्याली
पैंट की चढ़ी मोहरी
बहुत याद आई तोहरी
पवन के सुरसुराते सुर
झूमते झुंझुनाते झींगुर
मेढकों की टर्र टर्र
नज़र न आयें मगर
जीवंत जीव जन्तु
और कुछ .. किन्तु परन्तु
सीले-सीले अखबार आ गए
लो गीले
भीगे दिन आखिरकार आ गये
कुछ इस अंदाज़ से बहार आई है
बधाई है.... बधाई है.... बधाई है....
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वो रेनी डे की छुट्टियाँ
खिलखिलाते बच्चे बच्चियां
गुज़रती गाड़ी से उड़ते छींटे
याद कुछ .. गुज़रे पल बीते
प्रजा को फल राजा आम मिल गए
हमें भी गुठलियों के दाम मिल गए
झूमती बलखाती आई .. जब बरखा
किसने नहीं टटोला किसने नहीं परखा
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bahut sundar ...ek ek drishy saakaar !!!
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