Wednesday, February 26, 2014

! ! बात बरसात की ! !




छाते की छाँव
कीचड़ सने पांव
लबालब गलियां 
तैरती कागजी कश्तियां

खिड़कियों से आती फुहारें 
सीलन से सजी दीवारें  
कपड़े सुखाने का जुगाड़
कहाँ बांधे अब तार

नज़र आने लगी हरियाली
पकौड़ों संग चाय की प्याली
पैंट की चढ़ी मोहरी
बहुत याद आई तोहरी

पवन के सुरसुराते सुर
झूमते झुंझुनाते झींगुर
मेढकों की टर्र टर्र
नज़र न आयें मगर

जीवंत जीव जन्तु
और कुछ .. किन्तु परन्तु
सीले-सीले अखबार आ गए
लो गीले भीगे दिन आखिरकार आ गये

कुछ इस अंदाज़ से बहार आई है
बधाई है.... बधाई है.... बधाई है....

 ~ .. ~ .. ~ ..~ .. ~ .. ~ ..~ .. ~ .. ~ ..

वो रेनी डे की छुट्टियाँ
खिलखिलाते बच्चे बच्चियां
गुज़रती गाड़ी से उड़ते छींटे
याद कुछ .. गुज़रे पल बीते

प्रजा को फल राजा आम मिल गए
हमें भी गुठलियों के दाम मिल गए
झूमती बलखाती आई .. जब बरखा
किसने नहीं टटोला किसने नहीं परखा

~ .. ~ .. ~ ..~ .. ~ .. ~ ..~ .. ~ .. ~ ..

०:० एक कविता “उर्दू” के नाम ००

सबा, शहद, गुल, खुशबू बोलता हूँ
जी हाँ ... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

जनमी यहीं हिंदुस्तां में .. यहीं पली-बढ़ी है
जाने-अनजाने सही पर .. हम सबने पढ़ी है
फिरके, इलाके, सूबों में ..... महदूद नहीं है
नहीं ऐसी जगह कोई जहाँ ... मौजूद नहीं है
लहज़ा मिजाज़ पहुँच से ... वाकिफ बहुत हैं
दुनिया तमाम में इसके ... आशिक बहुत हैं

दिन घनेरी छाँव .. रात जुगनू बोलता हूँ
जी हाँ ......... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

जानते जिसे हम हैं ...‘खुसरो’ के ज़माने से
तहजीब, ‘मोहब्बत-ओ-मिठास’ के घराने से
‘मीर-ओ-ग़ालिब’ इन्ही में गज़ले बुनी है
जज़्बात तर्जुबानी को यहीं जुबां चुनी है
‘दाग-ओ-मोमिन’ की रवानियाँ है इस में
‘प्रेमचंद-ओ-मंटो’ की कहानियाँ है इस में

उस्तादों की लिखी-पढ़ी गुफ्तगू बोलता हूँ
जी हाँ .......... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

‘फिरदौसी’ का यही .......... फिरदौस मिलेगा
‘नसीम’, ‘चकबस्त’, ‘जिगर-ओ-जोश’ मिलेगा
‘इकबाल’, फ़िराक’, ‘बिस्मिल-ओ-मजाज़’ भी यहीं हैं
‘जांनिसार’, ‘कैफ़ी’, ..... ‘फैज़-ओ-फ़राज़’ भी यहीं हैं
‘मजरूह’, ‘हसरत’, और ‘साहिर’ भी कई है
इस फन के मुरीद और माहिर भी कई है

इनका ‘पैगाम-ए-मोहब्बत’ हरसू बोलता हूँ
जी हाँ ........... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

‘प्रदीप-ओ-दुष्यंत’ की इंक़लाबी पंक्तियां इसमें
‘नीरज-ओ-शैलेन्द्र’ की रूमानी पंखुड़ियां इसमें
‘आनंद’ ‘अनजान’ ‘इंदीवर’ ने गीत .... संजोये है
इसमें ‘शकील’ ‘नक्श’ ‘बावरा’ ने नगमें पिरोये है
‘शहरयार’, ‘समीर’ की गज़ले मिलेंगी
हर रंग में डूबी ..... कलमें मिलेंगी  

सरगम, संगीत, लय-ताल, घुंघरू बोलता हूँ
जी हाँ ............ जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

ये दौर भी ‘वसीम’, ‘गुलज़ार-ओ-मुनव्वर’ है
मुस्तकबिल महफूज़ है ..... सुनहरी सहर है
‘बशीर’ है कि .... नुमाइंदगी इसकी ‘बद्र’ करते है
जो जानते समझते है ‘एहतराम-ओ-कद्र’ करते है
ये जानकर .. सुकून औ ‘राहत’ भी है
नई नस्लों मोहब्बत औ चाहत भी है

तहजीब की ‘अमानत-ओ-आबरू’ बोलता हूँ
जी हाँ ............ जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

‘बहार-ओ-खिज़ा’ का ... हर ज़िक्र इसमें
जज़्बात, ख्वाब, ‘ख्याल-ओ-फ़िक्र इसमें
ग़ज़ल, नज़्म, कअता, रुबाइयाँ है इसमें
दास्तानें .. दिलचस्प कहानियाँ है इसमें
शायरी दिलकश मुख्तलिफ जुदा है
नस्र में भी लुत्फ़, ‘तंज़-ओ-मिज़ा’ है

इंसानी जज़्बात का .. हर पहलू बोलता हूँ
जी हाँ .......... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

माशूक को कातिल, दुश्मन-ए-जानां कहते है
नज़र को भी यहाँ ....... कातिलाना कहते है
आशिक यहाँ .... पागल, दीवाना होता है
तशबीह का .. अजीब ताना-बाना होता है
हर ‘लफ्ज़-ओ-लहजा’ शायराना होता है
फ़क़त सलीके से इसे फरमाना होता है

‘फ़साना–ओ-हकीकत’ रूबरू बोलता हूँ
जी हाँ ....... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

यूँही नहीं ‘मोहब्बत-ओ-ख़ुलूस’ .. पाया इसने
कई ज़बानों के लफ्जों को ... अपनाया इसने
बनके मिसरी .... और ज़बानों में घुल गई
अपना बना लिया .. जिससे मिलजुल गई
तमाम ‘रस्म-ए-ख़त’ ने ... इसे कुबूल किया है
रोमन, देवनागरी ने इसे और मकबूल किया है

वक़्त, ज़रूरीयात की जुस्तजू बोलता हूँ
जी हाँ ........ जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

तहजीब, अदब की .. निगेहबानी करती है
आशिक दिलों की ..... तर्ज़ुबानी करती है
रिन्दों औ साकी की .. गुफ्तगू है इसमें
शहीदों का इन्क़लाबी ..... लहू है इसमें
तवारीख की हकीकत .... हुबहू है इसमें
मोहब्बत करने वालो की .. रूह है इसमें

इत्तिफाकन सही, बात मौजू बोलता हूँ
जी हाँ ...... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

सियासतदानों, न मुखालिफत करने वालों से है
खतरा ‘उर्दू’ को ........... ‘उर्दू के ठेकेदारों’ से है
बांधना चाहते हैं गुलदानों में ... खुशबू को
चोट पहुँचती है इन हरक़तों से … ‘उर्दू’ को
बुनियाद किसी ‘मज़हब-ओ-धरम’ पे नहीं है
‘उर्दू’ .. किसी के ‘रहम-ओ-करम’ पे नहीं है

खुलकर तमन्ना, ‘हसरत-ओ-आरजू’ बोलता हूँ
जी हाँ ................. जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

~ ० ~ शुभ ‘उर्दू दिवस’ ~ ० ~ Happy ‘Urdu Day’~ ० ~

~ ० ~ ० ~ ‘यौम-ए-उर्दू’ की ढेरों मुबारकबाद ~ ० ~ ० ~

!! .. !! .. !! .. !! .. !! .. अमित हर्ष .. !! .. !! .. !! .. !! .. !!

! ~ ! ~ जुकरबर्ग की ये “मुख-पुस्तक” ~ ! ~ !

अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है
चौबीसों घंटे, सातों दिन रसास्वाद चलता है

हास्य-व्यंग्य, मुक्तक-गीत, कहानी-कविता,
शे’र-ओ-शायरी, ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई-ओ-क़तआ
सबका अलग आनन्द, सबका अलग मज़ा
मनोविनोद, हास-परिहास, परिचर्चा
शुभकामनाएं, दुआएं, प्रवचन
पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन
मौज-मस्ती, छेड़छाड़, हुडदंग
दिल्लगी, प्रणय, प्रेम प्रसंग
गोष्ठियां, आध्यात्मिक सत्संग

सामाजिक, राजनैतिक विश्लेषण सब साथ चलता है
अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है

अद्भुत प्रताप है इस “मुख-पुस्तिका” का
चुन्नू, मुन्नू, बबलू, पिंटू, बबली, तूलिका का 
कुसुम, लता, सुषमा, पड़ोस वाली सरिता का
चाचा-चाची, मामा-मामी, माता का पिता का
सबका अपना प्रोफाइल मिलेगा
लैपटॉप, टैब नहीं तो मोबाइल मिलेगा
छोटे बड़े अपने-पराये यहीं मिलते है
सारे तीज-ओ-त्यौहार अब यहीं मनते है

उत्साह, उमंग, उत्सव, उन्माद चलता है
अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है

इतना तो प्रत्यक्ष और स्पष्ट है
सबका अपना अपना पृष्ठ है
हम इसे अक्सर वाल कहते है इसी पे सब ख्याल-ओ-हाल कहते है
यहीं कई सुंदर सन्देश मिलेंगे
रोचक टिप्पणियाँ, लेख मिलेंगे
कॉफ़ी हाउस व कैंटीन की गुफ्तगू
हस्तियों के पेज और कई समूह
सब अपना अपना मत प्रकट करते है
कभी मान जाते है कभी हठ करते है

शास्त्रार्थ, तर्क-वितर्क, निरंतर संवाद चलता है
अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है

हर आयु, जाति, वर्ग, के
भिन्न सम्प्रदाय और धर्म के
अलग ‘आचार-ओ-विचार’, वर्ण के
लोग मिलेंगे
आज ही नहीं रोज़ मिलेंगे
नए नए प्रयोग मिलेंगे
आनंद लीजिये चैट के चटकारों का
नए चुटकुलों लतीफों, विचारों का
कहीं किसी ने मज़हबी, सियासी बहस छेड़ दी
तो किसी ने आकर वहीँ अपनी भड़ास उड़ेल दी
कोई किसी के पक्ष में खड़ा हो गया
इतनी ज़रा सी बात पे झगडा हो गया   

नित्य नया विषय, मुद्दा, विवाद चलता है
अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है

अमूमन सीधे, सरल,नेक मिलेंगे
कुछ उदार, सेक्युलर, हिप्पोक्रेट मिलेंगे
शोहदे, आशिक़, दिलफेंक मिलेंगे
एक ढूढिये अनेक मिलेंगे
और कई छद्म नाम से फेक मिलेंगे
जन्मदिन पे दुआएं, फूल, केक मिलेंगे
इस आभासी संसार का अहसास निराला है
बड़ी मादक, दिलकश मधुशाला है
कहीं उजला तो कहीं कुछ काला है

खट्टा-मीठा अनुभव साथ साथ चलता है
अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है

सुदूर बैठे पुराने-नये मित्र मिल जायेंगे
कुछ अनूठे अजूबे कुछ विचित्र मिल जायेंगे
कई हमदर्द भी सच्चे इर्द-गिर्द मिल जायेंगे
अद्भुत, अनोखे देखने को चित्र मिल जायेंगे
कुछ ऐसे देखकर दिल खिल जाते है
कई बिछड़े साथी सहपाठी मिल जाते है
सदुपयोग कीजिये या समय व्यर्थ कीजिये
मिल जायें कोई तो फ़्लर्ट कीजिये
पेज अपना, वाल अपनी,  पोस्ट अपना
यही सखा, यही बंधु, यही दोस्त अपना

हमसफ़र जैसे हाथो में लिए हाथ चलता है
अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है

अभिव्यक्ति का अद्भुत माध्यम ये
यही स्याही, यही कागज़, कलम ये
घुटते उद्गारों को जैसे वंश मिल गया
चारदीवारी में गृहणियों को मंच मिल गया
संग जन-भावनाओं के हर समाचार होता है
यूं समझिये पूरा का पूरा अखबार होता है
हर वेदना संवेदना का खुल के इज़हार होता है
कवि, लेखक तो कोई पत्रकार होता है
हर व्यक्ति विचारक, कलमकार होता है
तकरार, मोहब्बत, प्यार होता है
हर रिश्ता स्नेही प्रगाढ़ होता है

सिलसिला ये आठों-पहर दिन-रात चलता है
अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है

झुक जाए आसमान, वो ज़मीं भी यही है
कई आंदोलनों की पृष्ठ-भूमि भी यही है
समानांतर सापेक्ष सत्याग्रह, अनशन के लिए
यहीं लोग जुड़ जाते है किसी मिशन के लिए
नुक्कड़ नाटक सरीखा मंचन होता है
क्रांतिकारी, ओजस्वी भाषण होता है

इन्ही पन्नों पे ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद चलता है
अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है

आचार-व्यवहार, शिष्टाचार भी अनूठे है
कुछ सच्चे सही पर कुछ झूठे है
सब एक दूजे की केयर करते है
अपनी नहीं तो दूजे की शेयर करते है
कमेंट्स, लाइक्स का आदान-प्रदान होता है
बड़ी उदारता से प्रशंसा और बखान होता है
वाह वाह, बहुत खूब, उम्दा
तारीफों का जखीरा और पुलिंदा
हर पंक्ति, हर रचना, हर मुक्तक की
महिमा अपरम्पार है इस ‘मुख-पुस्तक’ की

जितना बांटिये उतना ये प्रसाद चलता है
अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है

कहीं लाइक्स, कमेंट्स की भरमार
कहीं अकाल और मंदी की मार
कहीं फ्रेंड-रिक्वेस्ट की बहुतायत
और कोई भेजे रिक्वेस्ट तो शिकायत
दाद कम, लेन-देन ज़्यादा होता है
कमेंट्स के लिए खूब तक़ादा होता है  
खुल के समर्थन, विरोध कीजिये
जिसे चाहिए पोक कीजिये
यदि व्यथित किसी से, या भर जायें मन
आजमायें ये ब्लॉक, डीएक्टिवेट ऑप्शन
चैट-बॉक्स तो कोई नोटिफिकेशन से परेशान है
टैग का भी अजीब मनोविज्ञान है
करो तो खफ़ा तो कोई न किये जाने से नाराज़ है
विस्मय, विलक्षण पर समृद्ध समाज है

इन छोटी छोटी पूँजी से ही ये समाजवाद चलता है
अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है

दूरियों, देशांतर के भेद मिट गए
सारे के सारे इस पिटारे में सिमट गए
अद्भुत कमाल इस तकनीकी तंत्र का
जाप निरंतर चलता है इस मंत्र का
जरिये इसके दुनिया जहान से रूबरू होते है
एक से खतम तो दूसरे से शुरू होते है
आंटी, अंकल, भाई, भाभी, दीदी और बहन
तो कहीं डियर, डार्लिंग का संबोधन 
संजीदा गुफ्तगू तो कहीं प्रेमालाप चलता है
यूंही इनबॉक्स व वाल पे वार्तालाप चलता है

बैठ बैठ कुर्सी पे सारा राजपाट चलता है
अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है

धन्यवाद, शुक्रिया, नवाज़िश अभिवादन होता है
हर प्रशंसा का कृतज्ञता से प्रतिपादन होता है
करुण, श्रृंगार, हास्य, हर रस का रसास्वादन होता है
बड़ी तत्परता व् निष्ठा से सब निष्पादन होता है
पोस्ट पकाइए, Like चखिए, कमेंट Taste कीजिये
न लिखिए खुद तो कॉपी–पेस्ट कीजिये
असीम अभिव्यक्ति की संभावनाएं देखिये
भाषा नहीं भावनाएं देखिये

सही-ग़लत स्पेलिंग, व्याकरण, अनुवाद चलता है
अविरल, अनवरत, अखण्ड पाठ चलता है

००० !!! महर्षि 'जुकरबर्ग' की इस अलौकिक कृति को समर्पित !!! ०००

( ~ फेसबुक प्रवास पे अपने सुखद 3 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ~ )

... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... आपका “अमित हर्ष”... ...

! : ! : ! : ! : हमारी आरुषि : ! : ! : ! : ! : !

हादसे थे .…. कि हद से पार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

कुसूर इतना … कि सच कह दिया
जो कुछ था पता … सब कह दिया
गलती बस इतनी ... कि गलत नहीं किया
किसी पर भी ... हमने शक नहीं किया
अंजाम हुआ कि शक के दायरे में आ गए
अनकहे बयान हमारे .. चर्चे में आ गए

‘तर्क-ओ-दलील’ सारे तार तार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

पीड़ा पीड़ित की जाना ही नहीं कोई
टूटा है पहाड़ हमपे .. माना ही नहीं कोई
हँसती खिलखिलाती मासूम बेटी गंवा दी
हमने सारे जीवन की पूँजी गंवा दी
इल्ज़ाम ये है कि कुछ छुपा रहे है हम
क्या बचा है अब .. जो बचा रहे है हम

पल पल जिंदगी के .... उधार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

उम्मीद थी कि दुनिया ढाढस बंधाएगी
उबरने के इस गम से तरीके सुझायेगी
पर लोगो ने तो क्या क्या दास्ताँ गढ़ ली
जो लिखी न जाए, .. ऐसी कहानी पढ़ ली
मीडिया ने हमारे नाम की सुर्खिया चढ़ा ली
चैनलों ने भी लगे हाथ .. टीआरपी बढ़ा ली

अंदाज-ओ-अटकलों से रंगे अखबार हो गए
और हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

हँसती खेलती सी एक दुनिया थी हमारी
हम दो ..... और एक गुड़िया थी हमारी
दु:खों को खुशियों की खबर लग गई
जाने  किस की नज़र लग गई
कुसूर ये जरूर कि हम जान नहीं पाए
शैतान हमारे बीच था, पहचान नहीं पाए
बगल कमरे में छटपटाती रही होगी
बचाने को लिए हमें बुलाती रही होगी
जाने किस नींद की आगोश में थे हम
खुली आँख ... फिर न होश में थे हम
ये ‘गुनाह’ हमारा ‘काबिल-ए-रहम’ नहीं है
पर मुनासिब नहीं कहना कि ... हमें गम नहीं है

खुद नज़र में अपनी .. शर्मसार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

पुलिस, मीडिया, अदालत से कोई गिला नहीं है
वो क्या कर रहे है ...... खुद उन्हें पता नहीं है
फजीहत से बचने को सबने .. फ़साने गढ़ दिए
इल्ज़ाम खुद की नाकामी के .. सर हमारे मढ़ दिए
‘अच्छा’ किसी को ... किसी को ‘बुरा’ बनाया गया
न मिला कोई तो हमें बलि का बकरा बनाया गया
असलीयत बेरहमी से मसल दी जाने लगी
फिर .. शक को सबूत की शकल दी जाने लगी

‘तथ्य’, .. ‘सत्य’ सारे निराधार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

सेक्स, वासना, भोग से क्यों उबर नहीं पाते
सीधी सरल बात क्यों हम कर नहीं पाते
बात अभी की नहीं ... हम अरसे से देखते है
हर घटना क्यों ... इसी चश्मे से देखते है
ईर्ष्या, हवस, बदले से भी ये काम हो सकते है
क़त्ल के लिए पहलू .. तमाम हो सकते है
जो मर गया उसे भी बख्शा नहीं गया
नज़र से अबतलक वो नक्शा नहीं गया
उम्र, रिश्ते, जज़्बात का लिहाज़ भी नहीं किया
कमाल ये कि .. किसी ने एतराज़ भी नहीं किया

कितने विकृत विषमय विचार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए

इन घिनौने इल्जामों को झुठलाना ही होगा
सच मामले का ... सामने लाना ही होगा
वरना संतुलन समाज का बिगड़ जाएगा
बच्चा घर में .. माँ बाप से डर जाएगा
कैसे कोई बेटी .... माँ के आँचल में सिमटेगी
पिता से कैसे .. खिलौनों की खातिर मचलेगी
गर .. साबित हुआ इल्ज़ाम तो ये समाज सहम जाएगा
रिश्तों का टूट ... हर तिलस्म जाएगा

बेमाने सारे रिश्ते नाते .. परिवार हो गए
हम अपने ही क़त्ल के गुनाहगार हो गए


~ ~ ~ { ...... “तलवार दम्पति” के दर्द को समर्पित ....... } ~ ~ ~

~ तो शायरी होती है ~

ग़म हो, हम हो, तन्हाई हो
~ तो शायरी होती है ~

हुस्न हो, अदा हो, अंगडाई हो
~ तो शायरी होती है ~

ख्यालात हो, जज़्बात हो, गहराई हो
~ तो शायरी होती है ~

इश्क हो, मोहब्बत हो, आशनाई हो
~ तो शायरी होती है ~

तसव्वुर हो, त’अश्शुक हो, तन्हाई हो
~ तो शायरी होती है ~

सुर हो, सुरा हो, सुराही हो
~ तो शायरी होती है ~

फ़स्ल हो, वस्ल हो, जुदाई हो
~ तो शायरी होती है ~

फरेब हो, धोखा हो, बेवफाई हो
~ तो शायरी होती है ~

ज़िक्र हो, चर्चा हो, रुसवाई हो
~ तो शायरी होती है ~

भूख हो, ग़ुरबत हो, महंगाई हो
~ तो शायरी होती है ~

कागज़ हो, क़लम हो, रोशनाई हो
~ तो शायरी होती है ~

रात हो, याद हो, नींद न आई हो 
~ तो शायरी होती है ~

रुठना-मनाना, मीठी सी लड़ाई हो
~ तो शायरी होती है ~

मौसम आशिक़ाना, रुत हसीं छाई हो
~ तो शायरी होती है ~

बहार में कहीं कोई कली मुस्कुराई हो
~ तो शायरी होती है ~

भूले से किसी की याद चली आई हो
~ तो शायरी होती है ~

संग सितारों के चांदनी उतर आई हो
~ तो शायरी होती है ~

खुला आकाश, छत हो, चारपाई हो
~ तो शायरी होती है ~

जग अपना या फिर हर शै पराई हो
~ तो शायरी होती है ~
 न फैसला, न इंसाफ, न सुनवाई हो
~ तो शायरी होती है ~

कंप्यूटर हो, मोबाइल हो,  Wi-Fi हो
~ तो शायरी होती है ~

महफ़िल हो, सामिअ हो, वाहवाही हो
~ तो शायरी होती है ~

जानते है सब, पर न किसी ने बताई हो
~ तो शायरी होती है ~

दिल दिलदार, पर पास न एक पाई हो
~ तो शायरी होती है ~

गैरों से मरहम, चोट अपनों से खाई हो
~ तो शायरी होती है ~

मुखालिफ़ हवाओं के शमां जलाई हो
~ तो शायरी होती है ~

लगा के बाज़ी दिल की किस्मत आजमाई हो
~ तो शायरी होती है ~

सनम बेवफा, बलम हरजाई हो
~ तो शायरी होती है ~

जुबां पे झूठ पर दिल में सच्चाई हो
~ तो शायरी होती है ~

दुःख में सुख और कोई सुख दुखदायी हो
~ तो शायरी होती है ~

हारकर खुद किसी को बाज़ी जिताई हो
~ तो शायरी होती है ~

फ़क़त रहने को जिंदा तमाम उम्र गंवाई हो
~ तो शायरी होती है ~

एक रोज़ मरने केलिए सारी जिंदगी बिताई हो
~ तो शायरी होती है ~

मुस्तकिल मुद्दों के मुख्तलिफ बात उठाई हो
~ तो शायरी होती है ~

:: याद आती हैं बहुत .. वो छुट्टियाँ .. गर्मियों की ::

तारों सजी रातें ...... तमतमाती दुपहरियों की
याद आती हैं बहुत ..वो छुट्टियाँ .. गर्मियों की

अधखिले, नाजुक, .. कच्चे थे हम
झूठ बोलते थे पर ... सच्चे थे हम
थोड़े से बुरे .... थोड़े अच्छे थे हम
वो दौर था ...... जब बच्चे थे हम
चढ़ते पारे के साथ मौसम गरमाने लगता था
आहट ग्रीष्म की .....  बसंत जाने लगता था
दिन चढ़ते चढ़ते आँगन तमतमाने लगता था
करीब है दिन छुट्टियों के .... बताने लगता था
खुल जाते थे दिल-ओ-दिमाग, स्कूल बंद होते थे
सच ! वो दिन ............ हमें बहुत पसंद होते थे 

चलो करते है ज़िक्र उन तमाम .. मस्तियों की
याद आती हैं बहुत ..वो छुट्टियाँ .. गर्मियों की

शिकंजी, निम्बू-पानी .. पना के दिन
रंगीन .... रस भरे .... रसना के दिन
पांच दस पैसे की .... ‘बर्फ़ की कैंडी’ थी
‘ऑरेंज-बार’ भी न ज्यादा .. महंगी थी
गली से जब ..... आइसक्रीम वाला गुजरता था
थोड़ा मुस्कुराकर दादी का बटुआ निकलता था
रेतकर मिलते थे .... वो गोले बरफ के
रंगीन चाशनी में .. नज़ारे हर तरफ़ के
मिठास न पूछिए उन चुस्कियों की
मटकी में बिकती उन कुल्फियों की

बगैर मिक्सी, .. मथनी वाली .. लस्सियों की
याद आती हैं बहुत . वो छुट्टियाँ .. गर्मियों की

कितनी लुभावनी थी वो दुनिया कॉमिक्स की
बेताल डायना .... लोथार मैनड्रैक की
हर किरदार ......  सच्चा और अपना लगता था
मिलना ‘चाचा चौधरी साबू’ से अच्छा लगता था
ऐतिहासिक पौराणिक गाथाओं मिलना शुरू हुए हम
‘अमर चित्र कथाओं’ से जब रुबरु हुए हम 
लोटपोट, मधु-मुस्कान के पन्ने
चंपक, नंदन, चंदा-मामा सब अपने
‘बिल्लू’, ‘डब्बू जी’ .. ‘श्रीमतीजी’ के किरदार
आप बतायें कौन नहीं करता था इनसे प्यार
जासूसी नावेल भी कुछ कमाल के थे
फैन हम तब .. राजन इकबाल के थे  

किस्से क्या सुनाएँ ..... अब उन कहानियों की
याद आती हैं बहुत .. वो छुट्टियाँ .. गर्मियों की
 
पाठ, .. सबक और न कोई उसूल होते थे
लंबी छुट्टियों के लिए बंद .. स्कूल होते थे
पलट के देखा .. हुए मुखातिब .. हम गुज़रे पलों से
इन दिनों ही मिलते थे हम मामा-मौसी के बच्चों से
निजात मिल चुकी होती थी इम्तिहान के पर्चों से
न कमाई की चिंता .. न सरोकार खर्चों से
उत्पात, शैतानियाँ वो छोटी-बड़ी हमारी
न पूछिए ...... वो धमा-चौकड़ी हमारी
नाक में दम कर देते थे नाना नानियों की  
इन्तिहाँ हो जाती थी ....... नादानियों की

फिर पिटाई, डांट डपट ..... पापा-मम्मियों की  
याद आती हैं बहुत .. वो छुट्टियाँ .. गर्मियों की

वाकिफ उस दौरान ‘लूडो’, ‘सांप-सीढ़ी’ से हुए
सीखकर बड़े इसी तरह पिछली पीढ़ी से हुए
कैरम, शतरंज, वो खेल .. ताश के
कोट-पीस, रमी, 'तीन-दो-पांच' के
लुका-छिपी और वो खेल ‘खो-खो’ का
हाथ के पंखे, टेबुल फैन के झोंकों का
किताबें सेल्फ में ... न रोज़ रोज़ का स्कूल था
तालाब वो गाँव का .. हमारा स्विमिंग पूल था
तैरती तस्वीर आँखों में उन डुबकियों की
प्यास बुझाती मटकों, घड़ों, सुराहियों की

चढ़ कर पेड़ पर चखते ........ उन अमियों की
याद आती हैं बहुत .. वो छुट्टियाँ .. गर्मियों की

शामें दूरदर्शन की .. वो रेडियो के दिन
बात न होगी मुकम्मल ... ये कहे बिन
‘हवामहल’, ‘जयमाला’, वो ‘भूले बिसरे गीत’
जिनसे जुड़ा है .. हमारा कल, हमारा अतीत
छत पे बैठकर .. ‘छाया-गीत’ के नगमें
गुज़रे वक़्त में सुने होंगे ... आप सबने ?
आवाज़ ‘अमीन सयानी’ की बाँध देती थी समां
याद कीजिये ‘एस कुमार का ‘फ़िल्मी मुकदमा’
‘मोदी के मतवाले राही’, ‘इंस्पेक्टर ईगल’
क्या क्या करें बातें .. क्या क्या करें गल
रात वो ..... पौने नौ का समाचार
हफ्ते में फ़क़त एक दिन चित्रहार
शुरुआत थी धारावहिको के प्रयोग की
बात क्यों न छिड़े फिर ‘हमलोग’ की
वही ‘बुनियाद’ थी ..... नई सोच की  

बातें बहुत हो गई आज .. पुराने टीवी रेडियो की
याद आती हैं बहुत .. वो छुट्टियाँ ... गर्मियों की

उन दिनों साहित्य से परिचय हो रहा था
बुनियाद मुस्तकबिल का तय हो रहा था
‘धर्मयुग’ ‘माधुरी’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’

‘सरिता’, ‘मुक्ता’, ‘मनोरमा’, ‘दिनमान’
इलस्ट्रेटेड वीकली, ब्लिट्ज पॉपुलर हुआ करते थे
पड़ोसी एक दूजे से ........ मांग कर पढ़ा करते थे
एक पकड़
थी इन पत्र-पत्रिकाओं, रिसालों में
सच ! .......... बड़ी बरक़त
थी उन सालों में
घर पे सजती पिताजी की ... वो साहित्यिक बैठकें
उन अदबी नशिस्त, गोष्ठियों के बारे में क्या कहें
आध्यात्मिक, राजनैतिक चर्चे हुआ करते थे
समझते .. तो कम थे ..... पर सुना करते थे
घर की लाइब्रेरी में मैथली, महादेवी, ... प्रेमचंद थे
दिनकर, निराला, सुमित्रा, सुभद्रा सब हमें पसंद थे
इन्हीं दौरान मुलाक़ात .. ‘मीर-ओ-मजाज़’ से हुई
ग़ालिब, दुष्यंत, फ़िराक, ‘फैज़-ओ-फ़राज़’ से हुई
जैसे 'बीते हुए कल' की …... आज से हुई
शुरुआत मेरी बीमारी की .. इलाज से हुई

टूटी-फूटी शायरी ... उन बेतुकी तुकबंदियों की
याद आती हैं बहुत .. वो छुट्टियाँ .. गर्मियों की

देखते देखते ....... एक कविता हो गई

न कही किसी से ...... पर बयां हो गई
देखते देखते ..... एक कविता हो गई  

विचारो में द्वंद
शब्दों से संबंध
आलिंगन अलंकारों से
सूरज चाँद सितारों से
प्राकृतिक कृत्रिम उपमाएं
हरदम लुभाएं
मनभावन भाव
समीप हर दुराव
रसों का रसास्वादन
धड़कन व स्पंदन
आनंद ही आनंद
सबकुछ लगे अपना
साकार होती कल्पना

रचना स्वयं ....... रचियता हो गई
देखते देखते .. एक कविता हो गई  

श्रृंगार की श्रुतियाँ
कोमल काव्य कृतियाँ
संयोग से सहयोग
वियोग में प्रयोग
वात्सल्य तो कहीं भक्ति
आसक्ति तो कहीं विरक्ति
वेदना व विलाप
और तनिक वार्तालाप
बातें अंतरंग
उमंग और तरंग
विरह और विषाद
प्रत्यक्ष प्रेम प्रसाद

हर शै ...... माशूक की अदा हो गई
देखते देखते .. एक कविता हो गई  

परिस्थितियाँ समाज की
बातें कल और आज की
आंदोलन या संघर्ष
धूर्तता व आदर्श
समर्थन तो कहीं समर्पण
नित्य डराता दर्पण
सांप्रदायिक ज़हर
जातिवाद का कहर
भद्रता व भ्रष्टता
शिष्टता व दुष्टता
विषाद और हर्ष
थोड़ा विचार विमर्श
सूत्र न कोई मंत्र
गड़बड़ होता गणतंत्र

‘लोक’ .. तो कहीं ‘तंत्र’ की हत्या हो गई
देखते देखते ....... एक कविता हो गई  

रिश्तों की रियासत
संबंधों में सियासत
बिखरते सिमटते परिवार
विस्तृत व संकीर्ण विचार
पीढ़ियों में मतभेद
किससे जताए खेद
पिता पुत्र में क्लेश
भाई भाई में द्वेष
संबंधियों से स्पर्धा
सबकी अपनी अपनी व्यथा
विघ्न व व्यवधान
न संभावित समाधान

दूसरी आई तो हल पहली समस्या हो गई
देखते देखते ........ एक कविता हो गई  

भाता एकांत
चंचल कभी शांत
कल्पनाओं में विचरण
संभावनाओं की किरण
ख्यालों में खलल
इच्छाएं और प्रबल
स्वप्न की सभाएं
जिरह और चर्चाएं
स्वयं से संवाद
विचारों में विवाद
आने लगा स्वाद
कुछ पल बाद
मन क्यों खिन्न हो गया
दृश्य अचानक भिन्न हो गया

लगा जैसे स्वयं से कोई खता हो गई
देखते देखते ... एक कविता हो गई