Wednesday, February 26, 2014

०:० एक कविता “उर्दू” के नाम ००

सबा, शहद, गुल, खुशबू बोलता हूँ
जी हाँ ... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

जनमी यहीं हिंदुस्तां में .. यहीं पली-बढ़ी है
जाने-अनजाने सही पर .. हम सबने पढ़ी है
फिरके, इलाके, सूबों में ..... महदूद नहीं है
नहीं ऐसी जगह कोई जहाँ ... मौजूद नहीं है
लहज़ा मिजाज़ पहुँच से ... वाकिफ बहुत हैं
दुनिया तमाम में इसके ... आशिक बहुत हैं

दिन घनेरी छाँव .. रात जुगनू बोलता हूँ
जी हाँ ......... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

जानते जिसे हम हैं ...‘खुसरो’ के ज़माने से
तहजीब, ‘मोहब्बत-ओ-मिठास’ के घराने से
‘मीर-ओ-ग़ालिब’ इन्ही में गज़ले बुनी है
जज़्बात तर्जुबानी को यहीं जुबां चुनी है
‘दाग-ओ-मोमिन’ की रवानियाँ है इस में
‘प्रेमचंद-ओ-मंटो’ की कहानियाँ है इस में

उस्तादों की लिखी-पढ़ी गुफ्तगू बोलता हूँ
जी हाँ .......... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

‘फिरदौसी’ का यही .......... फिरदौस मिलेगा
‘नसीम’, ‘चकबस्त’, ‘जिगर-ओ-जोश’ मिलेगा
‘इकबाल’, फ़िराक’, ‘बिस्मिल-ओ-मजाज़’ भी यहीं हैं
‘जांनिसार’, ‘कैफ़ी’, ..... ‘फैज़-ओ-फ़राज़’ भी यहीं हैं
‘मजरूह’, ‘हसरत’, और ‘साहिर’ भी कई है
इस फन के मुरीद और माहिर भी कई है

इनका ‘पैगाम-ए-मोहब्बत’ हरसू बोलता हूँ
जी हाँ ........... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

‘प्रदीप-ओ-दुष्यंत’ की इंक़लाबी पंक्तियां इसमें
‘नीरज-ओ-शैलेन्द्र’ की रूमानी पंखुड़ियां इसमें
‘आनंद’ ‘अनजान’ ‘इंदीवर’ ने गीत .... संजोये है
इसमें ‘शकील’ ‘नक्श’ ‘बावरा’ ने नगमें पिरोये है
‘शहरयार’, ‘समीर’ की गज़ले मिलेंगी
हर रंग में डूबी ..... कलमें मिलेंगी  

सरगम, संगीत, लय-ताल, घुंघरू बोलता हूँ
जी हाँ ............ जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

ये दौर भी ‘वसीम’, ‘गुलज़ार-ओ-मुनव्वर’ है
मुस्तकबिल महफूज़ है ..... सुनहरी सहर है
‘बशीर’ है कि .... नुमाइंदगी इसकी ‘बद्र’ करते है
जो जानते समझते है ‘एहतराम-ओ-कद्र’ करते है
ये जानकर .. सुकून औ ‘राहत’ भी है
नई नस्लों मोहब्बत औ चाहत भी है

तहजीब की ‘अमानत-ओ-आबरू’ बोलता हूँ
जी हाँ ............ जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

‘बहार-ओ-खिज़ा’ का ... हर ज़िक्र इसमें
जज़्बात, ख्वाब, ‘ख्याल-ओ-फ़िक्र इसमें
ग़ज़ल, नज़्म, कअता, रुबाइयाँ है इसमें
दास्तानें .. दिलचस्प कहानियाँ है इसमें
शायरी दिलकश मुख्तलिफ जुदा है
नस्र में भी लुत्फ़, ‘तंज़-ओ-मिज़ा’ है

इंसानी जज़्बात का .. हर पहलू बोलता हूँ
जी हाँ .......... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

माशूक को कातिल, दुश्मन-ए-जानां कहते है
नज़र को भी यहाँ ....... कातिलाना कहते है
आशिक यहाँ .... पागल, दीवाना होता है
तशबीह का .. अजीब ताना-बाना होता है
हर ‘लफ्ज़-ओ-लहजा’ शायराना होता है
फ़क़त सलीके से इसे फरमाना होता है

‘फ़साना–ओ-हकीकत’ रूबरू बोलता हूँ
जी हाँ ....... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

यूँही नहीं ‘मोहब्बत-ओ-ख़ुलूस’ .. पाया इसने
कई ज़बानों के लफ्जों को ... अपनाया इसने
बनके मिसरी .... और ज़बानों में घुल गई
अपना बना लिया .. जिससे मिलजुल गई
तमाम ‘रस्म-ए-ख़त’ ने ... इसे कुबूल किया है
रोमन, देवनागरी ने इसे और मकबूल किया है

वक़्त, ज़रूरीयात की जुस्तजू बोलता हूँ
जी हाँ ........ जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

तहजीब, अदब की .. निगेहबानी करती है
आशिक दिलों की ..... तर्ज़ुबानी करती है
रिन्दों औ साकी की .. गुफ्तगू है इसमें
शहीदों का इन्क़लाबी ..... लहू है इसमें
तवारीख की हकीकत .... हुबहू है इसमें
मोहब्बत करने वालो की .. रूह है इसमें

इत्तिफाकन सही, बात मौजू बोलता हूँ
जी हाँ ...... जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

सियासतदानों, न मुखालिफत करने वालों से है
खतरा ‘उर्दू’ को ........... ‘उर्दू के ठेकेदारों’ से है
बांधना चाहते हैं गुलदानों में ... खुशबू को
चोट पहुँचती है इन हरक़तों से … ‘उर्दू’ को
बुनियाद किसी ‘मज़हब-ओ-धरम’ पे नहीं है
‘उर्दू’ .. किसी के ‘रहम-ओ-करम’ पे नहीं है

खुलकर तमन्ना, ‘हसरत-ओ-आरजू’ बोलता हूँ
जी हाँ ................. जनाब, मैं उर्दू बोलता हूँ

~ ० ~ शुभ ‘उर्दू दिवस’ ~ ० ~ Happy ‘Urdu Day’~ ० ~

~ ० ~ ० ~ ‘यौम-ए-उर्दू’ की ढेरों मुबारकबाद ~ ० ~ ० ~

!! .. !! .. !! .. !! .. !! .. अमित हर्ष .. !! .. !! .. !! .. !! .. !!

1 comment:

  1. ज़नाब! आपकी कविता दिलकश है, काबिल-ए-तारीफ़ है।

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