न कही किसी से ...... पर बयां हो गई
देखते देखते ..... एक कविता हो गई
देखते देखते ..... एक कविता हो गई
विचारो में द्वंद
शब्दों से संबंध
आलिंगन अलंकारों से
सूरज चाँद सितारों से
प्राकृतिक कृत्रिम उपमाएं
हरदम लुभाएं
मनभावन भाव
समीप हर दुराव
रसों का रसास्वादन
धड़कन व स्पंदन
आनंद ही आनंद
सबकुछ लगे अपना
साकार होती कल्पना
रचना स्वयं ....... रचियता हो गई
देखते देखते .. एक कविता हो गई
श्रृंगार की श्रुतियाँ
कोमल काव्य कृतियाँ
संयोग से सहयोग
वियोग में प्रयोग
वात्सल्य तो कहीं भक्ति
आसक्ति तो कहीं विरक्ति
वेदना व विलाप
और तनिक वार्तालाप
बातें अंतरंग
उमंग और तरंग
विरह और विषाद
प्रत्यक्ष प्रेम प्रसाद
हर शै ...... माशूक की अदा हो गई
देखते देखते .. एक कविता हो गई
परिस्थितियाँ समाज की
बातें कल और आज की
आंदोलन या संघर्ष
धूर्तता व आदर्श
समर्थन तो कहीं समर्पण
नित्य डराता दर्पण
सांप्रदायिक ज़हर
जातिवाद का कहर
भद्रता व भ्रष्टता
शिष्टता व दुष्टता
विषाद और हर्ष
थोड़ा विचार विमर्श
सूत्र न कोई मंत्र
गड़बड़ होता गणतंत्र
‘लोक’ .. तो कहीं ‘तंत्र’ की हत्या हो गई
देखते देखते ....... एक कविता हो गई
रिश्तों की रियासत
संबंधों में सियासत
बिखरते सिमटते परिवार
विस्तृत व संकीर्ण विचार
पीढ़ियों में मतभेद
किससे जताए खेद
पिता पुत्र में क्लेश
भाई भाई में द्वेष
संबंधियों से स्पर्धा
सबकी अपनी अपनी व्यथा
विघ्न व व्यवधान
न संभावित समाधान
दूसरी आई तो हल पहली समस्या हो गई
देखते देखते ........ एक कविता हो गई
भाता एकांत
चंचल कभी शांत
कल्पनाओं में विचरण
संभावनाओं की किरण
ख्यालों में खलल
इच्छाएं और प्रबल
स्वप्न की सभाएं
जिरह और चर्चाएं
स्वयं से संवाद
विचारों में विवाद
आने लगा स्वाद
कुछ पल बाद
मन क्यों खिन्न हो गया
दृश्य अचानक भिन्न हो गया
लगा जैसे स्वयं से कोई खता हो गई
देखते देखते ... एक कविता हो गई
laajavaab ..!!
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